सैयद हैदर रज़ा का जीवन परिचय | Sayed Haider Raza Biography in Hindi

सैयद हैदर रज़ा की जीवनी, जन्म, मृत्यु, प्रमुख रचनाएँ, पुरस्कार और साहित्य | Sayed Haider Raza Biography, Birth, Awards and Literature in Hindi

जिन कलाकारों ने आधुनिक भारतीय चित्रकला को नया और आधुनिक बनाया है, उनमे सैयद हैदर रज़ा एक बहुत बड़ा नाम है. उनका सिर्फ़ इसी वजह से कला की दुनिया में आदर नहीं किया जाता बल्कि जिन कलाकारों ने आधुनिक भारतीय कला को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया उनमें हुसैन साहब और एफ.एन.सूजा के साथ सैयद हैदर रज़ा का नाम भी शामिल है. रज़ा पेरिस में जाकर बस गए और इस कारण उनकी कला में भारतीय और पश्चिमी कला का मेल देखने को मिलता है. वे लंबे समय तक पश्चिम में रहे और वहाँ की कला की बारीकियों से प्रभावित हुए. पेरिस में होते हुई भी उनका भारत से काफी जुड़ाव रहा. उनके द्वारा बनाया गया एक चित्र Seminal Work Saurashtra 2010 में क्रिस्टी की नीलामी में ₹16.42 करोड़ में बिका था.

सैयद हैदर को 1981 में पद्म श्री और 2013 में पद्म विभूषण से सम्मनित किया गया था. उन्हें 14 जुलाई 2015 को लीजन ऑफ ऑनर से सम्मानित किया गया था. उन्होंने भारतीय युवाओं में कला को बढ़ावा देने के लिए भारत में रज़ा फाउंडेशन की स्थापना कि, जो भारत में युवा कलाकारों को हर साल रज़ा फाउंडेशन पुरस्कार प्रदान करती है.

जीवन परिचय (Biography)

सैयद हैदर रज़ा का जन्म 22 फ़रवरी 1922 कक्कैया (मंडला जिला) मध्य प्रांत, ब्रिटिश इंडिया में हुआ था, जो अब वर्तमान में भारत के मध्य प्रदेश राज्य में है. 3 साल की उम्र में रज़ा मध्य प्रदेश से चले गए और अपनी हाई स्कूल की शिक्षा सरकारी हाई स्कूल से पूरी की. रज़ा ने चित्रकला की शिक्षा नागपुर स्कूल ऑफ़ आर्ट एवं सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट, मुंबई से प्राप्त की. उनके चार भाइयों और बहनों में से अधिकांश, भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए मगर उन्भाहोंने भारत में ही रहने का फेसला किया रत में अनेक प्रदर्शनियाँ आयोजित करने के बाद सन् 1950 में वे फ्रांसीसी सरकार के छात्र वीजा पर फ्रांस गए और फ्रांस में चित्रकला में आगे पढ़ाई जारी रखी.

अपनी पढ़ाई पूरी होने के बाद, उन्होंने पूरे यूरोप की यात्रा की और पेरिस में रहकर अपने चित्रों को प्रदर्शन करना जारी रखा. उन्हें 1956 में पेरिस में प्रिक्स डे ला क्रिटिक से सम्मानित किया गया, वह यह सम्मान पाने वाले पहले गैर-फ्रांसीसी कलाकार थे. उन्होंने फ्रांसीसी कलाकार जेनाइन मोंगिलाट से शादी की, जिनकी 2002 में कैंसर के कारण मृत्यु हो गई थी.

करियर(Career)

सैयद हैदर रज़ा ने अपने बनाए हुए चित्रों का पहला शो 1946 में बॉम्बे आर्ट सोसाइटी सैलून में 24 साल की उम्र में किया था और इस वर्ष ही उनको समाज के रजत पदक से सम्मानित भी किया गया. 1940 के दशक की शुरुआत में परिदृश्य (landscapes) और शहर के दृश्य (Townscapes) के अपने धाराप्रवाह पानी के रंगों (वॉटरकलर) से, वह एक अधिक अभिव्यंजक भाषा की ओर बढ़े दिमाग में ही परिदृश्य को चित्रित किया.

1947 यह वर्ष उनके जीवन को बदलने वाला एक महत्वपूर्ण वर्ष था क्योकि उस साल उनके माता और पिता दोनों की मृत्यु हो गई थी एवं उस साल ही उन्होंने के.एच.आरा और एफ.एन.सूजा के साथ मिलकर बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप की स्थपाना की. यह समूह भारतीय कला को यूरोपीय यथार्थवाद के प्रभाव से मुक्त होने और भारतीय अंतर ज्ञान को कला में लाने की दिशा में कम करता एवं 1948 में समूह ने अपना पहला चित्रकला का शो रखा था. 1940 से 1990 तक इस समूह के लोगों द्वारा कला की एक क्रांतिकारी (Revolutionary) राशि का निर्माण किया गया था.

रज़ा 1962 में अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में अतिथि प्राध्यापक बन गए. 1970 के दशक में रज़ा अपने स्वयं के काम से नाखुश और बेचैन हो गए थे और अपने काम में एक नई दिशा और गहरी प्रामाणिकता खोजना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने भारत की यात्रा की एवं विशेष रूप से एलोरा की गुफाओं में गए थे, उसके बाद वाराणसी, गुजरात और राजस्थान भी गए और भारतीय-संस्कृति का अधिक बारीकी से अध्ययन किया, जिसका परिणाम उनका एक प्रसिद्ध चित्र “बिंदु” था.

बिंदु 1980 में सामने आया और उसमे रज़ा अपने काम को गहराई तक ले गए एवं अपनी नई-नई भारतीय दृष्टि और भारतीय नृवंशविज्ञान लाए उनके द्वारा “बिंदु” की उत्पत्ति के कारणों में से एक उनके प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक हैं, जिन्होंने रज़ा को एकाग्रता से दूर पाया और ब्लैकबोर्ड पर एक बिंदु बनाया और उन्हें इस पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा. वह बिंदु रज़ा को समस्त भारतीय दर्शन से संबंधित लग रहा था. रज़ा की यह चित्रकारी इतनी दिलचस्पी इसलिए भी थी क्योंकि वह अपनी कला के लिए नई प्रेरणा की तलाश में थे और इसलिए उन्होंने अपने लिए सृजन का एक नया बिंदु बनाया. उनके काम ने एक और छलांग लगाई, जब उन्होंने भारतीय आध्यात्मिक पर अपने गहरे विचारों को व्यक्त करना शुरू किया, कुण्डलिनी और महाभारत से भी प्रभावित होकर अपने काम को आगे बढ़ाया. रज़ा के द्वारा लिखा गया एक प्रसिद्ध सम्मान ‘ग्रेड ऑव ऑफ़िसर ऑव द ऑर्डर ऑव आर्ट्स ऐंड लेटर्स’ है.

पुरस्कार(Awards)

  • 1946: सिल्वर मेडल, बॉम्बे आर्ट सोसाइटी, मुंबई
  • 1948: गोल्ड मेडल, बॉम्बे आर्ट सोसाइटी, मुंबई
  • 1956: प्रिक्स डे ला क्रिटिक, पेरिस
  • 1981: पद्म श्री; भारत सरकार
  • 1984: ललित कला अकादमी, नई दिल्ली की फैलोशिप
  • 1993: कालिदास सम्मान, मध्य प्रदेश सरकार
  • 2004: ललित कला रत्न पुरस्कार, ललित कला अकादमी, नई दिल्ली
  • 2013: पद्म विभूषण; भारत सरकार
  • 2013: महानतम जीवित वैश्विक भारतीय किंवदंतियों में से एक
  • 2014: डी. लिट (ऑनोरिस कौसा), इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़, छत्तीसगढ़
  • 2015: कमांडर डे ला लेगियन डी’होनूर (द लीजन ऑफ ऑनर); फ्रांस गणराज्य
  • 2015: डी. लिट (ऑनोरिस कौसा), शिव नादर उन

अंतिम समय

अपनी पत्नी की मृत्यु के कुछ साल बाद रज़ा ने फ़्रांस से वापस भारत में नई दिल्ली जाने का फैसला किया, जहाँ उन्होंने 22 जुलाई 2017 को 94 साल की उम्र तक भी नई-दिल्ली में अपनी मृत्यु तक दिन में कई घंटे काम जारी रखा. उनकी अंतिम इच्छा थी की उनके पिता की कब्र के बगल में उनकी कब्र हो एवं उनकी यह अंतिम इच्छा पूरी हुई.

“My work is my own inner experience and involvement with the mysteries of nature and form which is expressed in colour, line, space and light.”
सैयद हैदर रज़ा

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