वासुदेव बलवंत फड़के का जीवनी | Vasudev Balwant Phadke Biography in Hindi

वासुदेव बलवंत फड़के का जीवन परिचय | Vasudev Balwant Phadke History Biography, Birth, Education, Life, Death, Role in Independence in Hindi

“आज मृत्यु के मुँह पर खड़े है, गुलामी की इस लज्जापूर्ण स्तिथि से मर जाना बेहतर है. मैं भगवन या सरकार से नहीं डरता क्योकि मैंने कोई पाप नहीं किया है.”

– Vasudev Balwant Phadke

मित्रों, इस लेख में हम आपको क्रांतिकारी वासुदेव बलवंत फड़के का जीवन परिचय बताने जा रहे है. अंग्रेज़ो की जुल्मी हुकूमत से भारत को आज़ादी दिलाने में जो वीर शहीद हुए, उनमें से ही एक थे वासुदेव बलवंत फड़के.

जितने भी वीरपुरुषों ने भारतमाता को अंग्रेज़ो के जुल्म से मुक्त किया, वे किसी भगवान से कम नहीं थे. उस समय इन महापुरुषों ने जो भी कदम उठाये थे, वे उस समय उभरी परिस्थिती को संभालने केलिए लिए गए थे. आज जब हम पुस्तके पढ़के, ब्लॉग पढ़के किसी महापुरुष के विचारों तथा उनके द्वारा लिए गए फैसलों पर चर्चा करें, उस समय मुझे लगता है कि, हमे उनपर टिका-टिपण्णी करने से बचना चाहिए. क्योकि, वास्तविक में उस समय बहुत ज्यादा कठिन परिस्थितिया थी. इतनी कठिन परिस्थितियों में वे लढे और हमारे देश को आज़ादी दिलाई, यह कोई आसान कार्य नहीं था.

तो चलिए आज के इस लेख की शुरुआत करते है –

प्रारम्भिक जीवन| Vasudev Balwant Phadke Early Life

नामवासुदेव बलवंत फड़के ( Vasudev Balwant Phadke)
जन्मतिथि4 नवम्बर 1845
जन्मस्थानशिरढोणे गांव, रायगढ़ ज़िला, महाराष्ट्र
धर्महिन्दू
राष्ट्रीयताभारतीय
पिताबलवंत फड़के
मातासरस्वती बाई
Vasudev Balwant Phadke Early Life

वासुदेव फड़के जी का जन्म 4 नवंबर 1845 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के शिरढ़ोणे गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम बलवंत फड़के तथा माता का नाम सरस्वती बाई था, जो धार्मिक प्रवृत्ति की थी.

वे बचपन से ही तेज़ बुद्धि वाले छात्र रहे थे. उन्होंने बड़ी कम उम्र में मराठी, संस्कृत तथा अंग्रेजी भाषा में प्रभुत्व पाया था. वे बहुत ही कम उम्र से देश के प्रति राष्ट्रप्रेम की भावना रखते थे. जैसे जैसे उनकी उम्र बढ़ती चली गयी, उनकी यह भावना और भी मजबूत होती गयी. उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई कल्याण और पुणे में रहकर पूरी की थी. उनके पीता की जिज्ञासा थी कि वे बहुत बड़े व्यावसायिक बने, लेकिन उन्होंने यह बात नहीं मानी और वे मुंबई चले गए. मुंबई में उन्होंने नौकरी के साथ साथ पढाई भी जारी रखी.

निजी जीवन

वासुदेव फड़के ने 28 साल की उम्र में अपनी पहली शादी की थी, लेकिन पहली पत्नी की मृत्यु के बाद फिर उन्होंने दूसरा विवाह किया था.

जीवन सफ़र | Vasudev Balwant Phadke Life Journey

आजीविका के हेतु से, वासुदेव फड़के 15 वर्ष तक महाराष्ट्र के अलग अलग जिलों में नौकरी केलिए बदली करते रहे. वर्ष 1870 में इन्हे गोविन्द रानाडे का भाषण सुनने का अवसर प्राप्त हुआ, इस समय वे इस भाषण से आत्यंतिक प्रभावित हो चुके थे. आजीविका के हेतु से, वासुदेव फड़के 15 वर्ष तक महाराष्ट्र के अलग अलग जिलों में नौकरी केलिए बदली करते रहे. वर्ष 1870 में इन्हे गोविन्द रानाडे का भाषण सुनने का अवसर प्राप्त हुआ, इस समय वे इस भाषण से आत्यंतिक प्रभावित हो चुके थे. भाषण का मुख्य विषय था ‘अंग्रेजों द्वारा भारत में आर्थिक लूट’. इस भाषण ने उनके मन में अंग्रेज़ो के इस प्रकार के दुर्व्यवहार के प्रति चीड़ पैदा कर दी थी. इसलिए उन्होंने अंग्रेज़ो को सबक सिखाने का मन बना लिया था.

इस कार्य को अंजाम देने केलिए उन्हें भारतीयों के सहायता की आवश्यकता थी. इसलिए उन्होंने विविध जाती, धर्म के लोगों का संगठन किया और वे अपने विचार उन लोगों तक भाषण द्वारा पहुंचाने लगे. ऐसा कहा जाता है कि, वासुदेव फड़के गल्ली, मोहल्ले एक थाली और चमचा बजाकर लोगों को इकठ्ठा करते थे और सामान्य जनता को अंग्रेज़ो से कैसे बचा जाए उसके लिए सलाह देते थे.

उन्होंने अनेक जगह पर क्रांतिकारियों के लिए व्यायाम शाला बनाई जिसमें उनको शस्त्रों का प्रशिक्षण दिया जाता था. इस व्यायाम शाला में ज्योतिबा फुले और उनके साथी तथा लोकमान्य तिलक जैसे प्रमुख क्रांतिकारीयो ने भी शस्त्र चलाना सीखा था.

काले पानी की सजा | Vasudev Balwant Phadke Black Water Punishment

वर्ष 1879 में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की घोषणा कर दी. इस कार्य केलिए धन की जरूरत पड़ने पर खजाने भी लुटे और कई अंग्रेज़ो को मौत के घाट उतारा. वासुदेव फड़के की क्रांतिकारी गतविधियां देख अंग्रेज़ शासक भी थरथराने लगी थी. उनकी गिरफ्तारी केलिए अंग्रेजी पुलिस द्वारा कई योजनाए बनाई गई, लेकिन वे नाकाम रही. फड़के को जिन्दा या मुर्दा पकड़वाने केलिए 50 हज़ार तक के इनाम भी रखे गए. लेकिन, एक दिन मंदिर में विश्राम लेते समय उन्हें पुलिस द्वारा पकड़ा गया, और उन्हें गिरफ्तार किया गया.

उनके उपर राजद्रोह का मुकदमा चला और उन्हें आजन्म कालापानी की सज़ा देकर फड़के को ‘अदन’ भेज दिया गया. अदन पहुँचने के बाद फड़के ने वहासे भागने की कोशिश की, लेकिन उन्हें पकड़ लिया गया. सलाखों के पीछे उनके साथ जुल्मी बर्ताव किया गया. 17 फरवरी 1883 को उनका अदन के जेल में निधन हो गया.

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