अग्निहोत्र क्या है? इसे करने की विधि और लाभ | Agnihotra Mantra in Hindi

अग्निहोत्र क्या है? इसे करने की विधि और लाभ | Agnihotra Mantra in Hindi : वेदों के अनुसार पाँच प्रकार के यज्ञों के बारे में बताया गया है – ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेवयज्ञ और अतिथियज्ञ. इसमें से देव यज्ञ जो सत्संग या अग्निहोत्र से कर्म के द्वारा होता है. इसमें वेदी बनाकर अग्नि प्रज्ज्वलित कर होम किया जाता है. इसी को अग्निहोत्र यज्ञ कहा जाता है.

अग्निहोत्र यज्ञ का वर्णन ‘यजुर्वेद’ में किया गया है. अग्निहोत्र से तात्पर्य एक ऐसे होम (आहुति) से है जिसे प्रतिदिन किया जा सकता है तथा उसकी अग्नि को बुझने नहीं दिया जाता है. महाभारत आश्वमेधिक पर्व के अंतर्गत अध्याय 92वें में अग्निहोत्र की महत्ता का वर्णन किया गया है. इस यज्ञ में व्यक्ति आहुति देकर भगवान की उपासना करते हैं. इस यज्ञ के बारे में वेदों में भी बताया गया है. सर्वप्रथम दयानंद सरस्वती ने इस यज्ञ को अपनी पंच महायज्ञ विधि में प्रस्तुत किया था. यहीं से इस यज्ञ की महत्ता बढ़ गयी.

इस यज्ञ को करने से ‘देव ऋण’ चुकता है. यह यज्ञ आपातकालीन स्थिति के लिए ही नहीं बल्कि प्रतिदिन करने के लिए भी उपयुक्त है. ऐसा कहा जाता है कि अग्निहोत्र यज्ञ से उत्पन्न अग्नि से ‘रज और तम’ कणों का नाश होता है. इस यज्ञ से उत्पन्न अग्नि मनुष्य को 10 फीट तक सुरक्षा कवच प्रदान करती है. इस हवन में प्रयोग किया जाने वाला पात्र विशेष आकृति और तांबे का होता है. इस यज्ञ में शुद्ध और साबूत चावलों का प्रयोग करना चाहिए. गाय के गोबर से बने उपलों का प्रयोग करना चाहिए.

वैदिक अग्निहोत्र यज्ञ करने की विधि

इस यज्ञ को करने के लिए सदा पूर्व दिशा की और मुख करके बैठना चाहिए. सर्वप्रथम यज्ञ करने वाले पात्र को पूजा स्थल पर रखें, उसके अन्दर उपले का एक छोटा टुकड़ा घी लगाकर रखें व उसके आस – पास और भी उपले रखें. अब एक छोटे उपले में घी लगाकर प्रज्वल्लित करें और उसे उपलों के बीच में रख दें.

विशेष– घी का ही प्रयोग करें और अग्नि प्रज्ज्वलित करने के लिए मुँह से न फूंकें. इस प्रक्रिया के दौरान अनेक मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है, जैसे – आचमन करने के लिए, ईश्वर की स्तुति के मन्त्र, दीपक जलाने का मन्त्र, अग्नि प्रज्ज्वलित करने का मन्त्र, समिधा रखने का मन्त्र आदि से आहुति दी जाती है.

अग्निहोत्र मंत्र –

Agnihotra Timings and Mantra : सूर्योदय और सूर्यास्त के समय ही यह यज्ञ करने का महत्त्व बताया गया है. इसमें प्रातःकाल 12 आहुतियाँ और सांयकाल 12 आहुतियाँ दी जाती हैं. सूर्योदय के समय निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए –

सूर्याय स्वाहा सूर्याय इदम् न मम .
प्रजापतये स्वाहा प्रजापतये इदम् न मम ..

सूर्यास्त के समय निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए –

अग्नये स्वाहा अग्नये इदम् न मम .
प्रजापतये स्वाहा प्रजापतये इदम् न मम ..’


घर के किसी एक व्यक्ति को ‘अग्निहोत्र’ करना चाहिए व अन्य सदस्यों को साथ में मंत्रोच्चारण करना चाहिए. आहुति करने के लिए व्यक्ति को अपने दाहिने हाथ की मध्यमा, अनामिका अँगूठे की सहायता से अक्षत मिश्रण को यज्ञ पात्र में अर्पण करना चाहिए. अग्निहोत्र करने का सही समय सूर्योदय या सूर्यास्त ही है.

अग्निहोत्र के उपरांत कोशिश करें कि अग्नि शांत होने तक ध्यान अवस्था में बैठें. अग्नि शांत होने के उपरांत उसकी भस्म को सुरक्षित किसी पात्र में रखें व पेड़ – पौधों के लिए खाद के रूप में उपयोग करें.

अग्निहोत्र मन्त्र के लाभ | Benefits Of Agnihotra Mantra

इस मंत्र के अनंत लाभ बताये गए हैं. इनमें से कुछ लाभ निम्नलिखित हैं – इस यज्ञ को करने से वायु शुद्ध होती है, यह यज्ञ लोगों को रोग मुक्त बनाता है. धन – धान्की समस्या, खाद्यान की समस्या, संतान प्राप्ति की समस्या दूर होती है, यहाँ तक की मोक्ष की प्राप्ति होती है. यज्ञ से उत्पन्न धुएं से आस – पास का दूषित वातावरण शुद्ध व स्वच्छ हो जाता है. इससे आस – पास के कीटाणु भी नष्ट हो जाते हैं. इस यज्ञ को करने से लोगों के मन में सकारात्मक भाव उत्पन्न होता है. इस यज्ञ को करने से मनुष्य की कठिनाई दूर होती है. इस यज्ञ को करने से व्यक्ति अन्य लोगों की अपेक्षा निरोगी बनते हैं व स्वस्थ रहते हैं. यज्ञ के दौरान मंत्रोच्चारण से ईश्वर की कृपा सदा बनी रहती है.

इस संसार में परमेश्वर ने हमें सब कुछ प्रदान किया है, कृतज्ञतावश हमें प्रतिदिन अग्निहोत्र करने के लिए समय निकालना चाहिए. इस यज्ञ को स्वयं करना चाहिए व दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करना चाहिए.

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