भाषण क्या होता हैं और इसके नियम | Bhashan ki Paribhasha aur Niyam

हिंदी व्याकरण के अनुसार भाषण की परिभाषा, नियम और उदाहरण | Definition of Bhashan (Speech), Rules and Example in Hindi | Bhashan ki Paribhasha aur Niyam

वर्तमान समय में मौखिक अभ्यर्थियों में भाषण (Bhashan) का स्थान सर्वोपरि है. लोकतांत्रिक प्रणाली जिसने हर व्यक्ति को अपने विचार व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता दी है अतः सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक शैक्षिक सभी मंचों से सक्रिय विचार द्वारा लोग अपना पक्ष प्रबलतम से रखना चाहते है. आमजन को अपने विचारों से अवगत कराने व समर्थन जुटाने का सबसे सशक्त माध्यम भाषण है. भाषण एक कला है इस कला का उद्देश्य अपने श्रोताओं में अधिक से अधिक जोश पैदा कर उन पर प्रभाव जमाना होता है यही भाषण की सफलता मानी जाती है.

भाषण के नियम (Bhashan Ke Niyam)

अच्छे भाषण के लिए कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक है.

  1. मंच पर बोलने से पहले वक्ता द्वारा बोलने वाले विषय पर भली प्रकार विचार करना चाहिए.
  2. भाषण (Bhashan) को लिखित रूप से तैयार कर लिया जाना चाहिए.
  3. मंच पर आने से पूर्व अपनी वेशभूषा पर विशेष ध्यान दें भड़काऊ, असभ्य व अव्यवस्थित रूप से मंच पर नहीं जाना चाहिए.
  4. भाषण आरंभ करने से पहले अध्यक्ष अतिथियों व सौदागरों को संबोधित करने की औपचारिकताएं निभाई और अंत में धन्यवाद भी करना चाहिए.
  5. भाषा अत्यंत सरल प्रभावशाली सजीव और श्रोताओं के अनुरूप हो. बीच-बीच में सूक्तियां उदाहरणों काव्य पंक्तियों व शेरों आदि के द्वारा जीवंतता लाने का प्रयत्न करें.
  6. आत्मविश्वास धैर्य व स्पष्टता के साथ उचित भाव मुद्राओं के माध्यम से अपनी बात प्रस्तुत करें.
  7. समय का ध्यान रखें निर्धारित समय में ही अपना भाषण समाप्त करें.
  8. उपयुक्त विशेषताओं को दर्शाते हुए भाषण का नमूना
  9. पांचवी कक्षा तक विद्यार्थियों को कोई प्रकार ना दिया जाए इस विषय पर विचार गोष्ठी के लिए 2 मिनट का भाषण

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भाषण का उदाहरण (Bhashan Example)

आदरणीय अध्यक्ष महोदय, आमंत्रित अतिथि गण, आदरणीय अध्यापक एवं उपस्थित श्रोतागण, सभी को मेरा नमस्कार.

यह मेरे लिए सौभाग्य का अवसर है कि मैं उस पीड़ा और कष्ट को व्यक्त कर पा रहा हूं. जिसे मैंने बचपन में स्वयं झेला था. गृह कार्य मिले या ना मिले इस विषय पर गोष्ठी करना इस बात का शुभ संकेत है कि देर से ही सही बच्चों की चिंता तो की जाने लगी है.

लगभग सभी शिक्षाविद आधी शताब्दी से इस शिक्षा प्रणाली की व्यर्थता अनुभव कर रहे हैं. जिसमें केवल पुस्तक की जानकारी पर ही बल दिया जाता है. नई शिक्षा नीति के अंतर्गत शिक्षा को नए विषयों व क्षेत्रों से जोड़ने के उद्देश्य से पुराने विषयों के साथ साथ कंप्यूटर टाइपिंग, डांस, ड्रामा, चित्रकला, हस्तकला आदि पाठ्य से अतिरिक्त गतिविधियों को भी जोड़ दिया गया हैं, लेकिन साथ ही इन सभी विषयों की पुस्तकें लादकर बस्ते का बोझ भी बढ़ा दिया गया. सभी विषयों की चलताऊ सी जानकारी कक्षा में ही दे दी जाती है क्योंकि समय की सीमा है. शेष काम घर से करने के लिए दे दिया जाता है. इसका कारण यह है कि विद्यालय प्रशासन शिक्षक व शिक्षिकाओं से काम का प्रमाण लिखित रूप में जाता है और शिक्षक भी अति उत्साही बनकर अधिक से अधिक लिखित काम करवा लेना चाहते है.

अब जरा विचार करें 4 से 10 साल तक के उस मासूमों पर क्या बीती है जो सुबह 6:00 या 6:30 बजे उठकर कुछ खाए पिए बिना विद्यालय की ओर चल पड़ते हैं. विद्यालय के 6 घंटे और आने-जाने के लगभग 6 घंटे के पश्चात थके हारे घर लौटते हैं. घर रहने वाली माताये खाना पहले से ही लाकर तैयार रखती है और जब तक बच्चा हाथ मुंह धोकर कपड़े बदले खाना खाए तब तक उसके बस्ते की छानबीन कर यह जानने का प्रयास करती है कि उसने क्या-क्या काम करना है. भोजन समाप्त होने के बाद ही घर पर दूसरा स्कूल शुरू हो जाता है. बच्चा सोना चाहता है पर वो समझती है, सो गया तो दो-तीन घंटे खराब हो जाएंगे वह थोड़ी देर के लिए घर फ्री में सही खेलना चाहता है. पर पहले काम खत्म करने की शर्त के साथ लगी होती है. मानव बच्चा आदमी नहीं मशीन है जो ना कभी थकता है ना ऊबता है. परिणाम होता है धीरे-धीरे बच्चे का मन पढ़ाई से हटने लगता है वह तरह-तरह के बहाने बनाने लगता है उसके मन का अप्रत्यक्ष दबाव उसे शारीरिक और मानसिक रूप से रोगी बना देता है. बचपन का खेलना, कूदना चहकना और बेफिक्री सब गृह कार्य पर न्योछावर कर दी जाती है.

काम पुराना होने पर या आधा अधूरा होने पर विद्यालय में शिक्षक और घर पर माता पिता दोनों ही बालक को प्रताड़ित करते हैं. बच्चे विरोध तो कर नहीं पाते पर उनका बाल मन घुट-घुट कर ही वही दम तोड़ देता है और उन्हें विद्रोही व विकृत मनोवृत्ति का बना देता है. यह कोई कोरी कल्पना या करुणा पूर्ण साहसिक वर्णन नहीं अभी तो आज की हकीकत है. अतः मैं ही नहीं आप सब भी इस बात से सहमत होंगे कि कम से कम पांचवी कक्षा तक के विद्यार्थियों को घर के लिए कोई कार्य न दिया जाए ताकि वह अपने बचपन का आनंद ले सके.

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