अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ का जीवन परिचय | Ashfaqulla Khan Biography in Hindi

Ashfaqulla Khan Biography(Birth, poetry and Death), Role in Kakori Kand in Hindi |अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ का जीवन परिचय और काकोरी कांड में भूमिका

अमर शहीद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ भारत माँ में सच्चे सपूत थे. मात्र 27 वर्ष की उम्र में अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान देकर फांसी के फंदे को चूम लिया था. अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ एक बेहतरीन उर्दू शायर भी थे. अपने अन्य मित्रों के साथ अशफ़ाक उल्ला खां ने काकोरी कांड में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

Biography:

बिंदु(Points) जानकारी (Information)
पूरा नाम(Full Name) अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ वारसी ‘हसरत’
जन्म(Birth) 22 अक्टूबर 1900
जन्म स्थान(Birth Place) शाहजहांपुर
पिता का नाम(Father Name) मोहम्मद शफीक उल्ला ख़ाँ
भाई(Brother Name) रियासत उल्ला ख़ाँ
माताजी(Mother Name) मजहूर-उन-निसा

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ जन्म और प्रारंभिक जीवन(Ashfaqulla Khan Birth and Life History)

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ का जन्म 22 अक्टूबर 1900 को उत्तरप्रदेश के शाहजहांपुर जिले के जलालनगर में हुआ था. इनका पूरा नाम अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ वारसी ‘हसरत’ था. इनका परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था. इनके पिताज़ी का नाम मोहम्मद शफीक उल्ला ख़ाँ था जो कि पठान परिवार से सम्बन्ध रखते थे.

इनकी माताजी का नाम मजहूर-उन-निसा था जो कि एक गृहिणी महिला थी. इनकी माताजी के परिवार के लोग काफी पढ़े लिखे थे. उनमें से बहुत उच्च पदों पर कार्यरत थे. अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ परिवार में सबसे छोटे थे और उनके तीन बड़े भाई थे. परिवार में सब उन्हें प्यार से अच्छू कहते थे.

बचपन से ही अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ को खेलने, घुड़सवारी, निशानेबाजी और तैरने का बहुत शौक था और वे उर्दू में कविता भी किया करते थे. बचपन से अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ में देश के प्रति कुछ करने का जज्बा था. वे हमेशा इस प्रयास में रहते थे कि किसी क्रांतिकारी दल का हिस्सा बना जाएं. इसके लिए वे कई लोगों से संपर्क करते रहते थे.

Ashfaqulla Khan Biography in Hindi
Ashfaqulla Khan

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ की रामप्रसाद बिस्मिल से मुलाक़ात (Ashfaqulla Khan and Ramprasad Bismil Meeting)

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ के बड़े भाई रियासत उल्ला ख़ाँ रामप्रसाद बिस्मिल के सहकर्मी थे. वे अक्सर अशफाक को उनकी बहादुरी के किस्से सुनाया करते थे. उन्होंने बताया कि वे एक कवि भी हैं. जब वर्ष 1920 में मैनपुरी कांड के बाद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ को पता लगा कि रामप्रसाद बिस्मिल उन्ही के शहर में है तो उन्होंने बिस्मिल जी से कई बार उनसे मुलाकात की. परन्तु बिस्मिल से उनकी कोई यादगार अनुभूति नहीं बन पाई.

वर्ष 1922 में असहयोग आन्दोलन के दौरान रामप्रसाद बिस्मिल ने शाहजहाँपुर में एक बैठक का आयोजन किया. उस बैठक के दौरान बिस्मिल ने एक कविता पढ़ी थी. जिस पर अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने आमीन कहकर उस कविता की तारीफ की. बाद में रामप्रसाद बिस्मिल ने उन्हें बुलाकर परिचय पुछा. जिसके बाद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने बताया की वह रियासत ख़ाँ जी का छोटा सगा भाई और उर्दू शायर भी हैं. कुछ समय बाद वे दोनों बहुत ही अच्छे दोस्त बन गए. जिसके बाद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने रामप्रसाद बिस्मिल के संघठन “मातृवेदी” के सक्रीय सदस्य के रूप में कार्य करना शुरू कर दिया.

इस तरह से वे क्रांतिकारी जीवन में आ गए. वे हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे.

काकोरी कांड की जानकारी (Kakori Kand information)

तारीख 9 अगस्त 1925
क्रान्तिकारी अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ, राजेन्द्र लहरी, चंद्रशेखर आज़ाद, सचिन्द्र बक्षी, केशब चक्रबर्ती, मन्मथनाथ गुप्ता, मुरारीलाल गुप्ता, मुकुन्दीलाल गुप्ता और भंवरीलाल
जगह काकोरी
कुल लूट 4601 रुपये
सजा बिस्मिल, रोशन सिंह, लहरी और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ को फांसी
बाकि क्रांतिकारियों को कालापानी की सजा

Ashfaqulla Khan Biography in Hindi

काकोरी कांड / काकोरी ट्रेन लूट में भूमिका (Role of Ashfaqulla Khan in Kakori Kand )

9 अगस्त 1925 को रेल से ले जाये जा रहे सरकारी खजाने को क्रान्तिकारियों द्वारा लखनऊ के पास काकोरी रेलवे स्टेशन के पास लूट लिया गया. इस काण्ड को पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ और 8 क्रांतिकारियों ने मिलकर अंजाम दिया था. इस कांड में अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उन्होंने ही ड्राइवर की कनपटी पर बन्दूक रखकर ट्रेन को रोका था. इस ट्रेन डकैती में कुल 4601 रुपये लूटे गए थे. जिसके बाद ये सभी क्रांतिकारी फरार हो गए. परन्तु बिस्मिल के साझीदार बनारसीलाल से मिलकर पुलिस ने इस डकैती का सारा भेद प्राप्त कर लिया.

26 सितम्बर 1925 की रात में बिस्मिल के साथ समूचे हिन्दुस्तान से इस काकोरी कांड में शामिल सभी क्रांतिकारियो को गिरफ्तार कर लिया गया. दो लोग अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ और शचीन्द्रनाथ बख्शी को तब गिरफ्तार किया गया जब इस कांड का मुख्य फैसला आ चुका था.

Ashfaqulla Khan Biography in Hindi

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ की मृत्यु (Ashfaqulla Khan Death)

19 दिसम्बर 1927 की शाम फैजाबाद जेल की काल कोठरी में काकोरी कांड, सरकारी खजाना लूटने के जुर्म में फांसी दे दी गई.

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अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ की कविता (Ashfaqulla Khan Poem)

कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएंगे,
आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे.

हटने के नहीं पीछे, डरकर कभी जुल्मों से,
तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे.

बेशस्त्र नहीं हैं हम, बल है हमें चरख़े का,
चरख़े से ज़मीं को हम, ता चर्ख़ गुंजा देंगे.

परवा नहीं कुछ दम की, ग़म की नहीं, मातम की,
है जान हथेली पर, एक दम में गंवा देंगे.

उफ़ तक भी जुबां से हम हरगिज़ न निकालेंगे,
तलवार उठाओ तुम, हम सर को झुका देंगे.

सीखा है नया हमने लड़ने का यह तरीका,
चलवाओ गन मशीनें, हम सीना अड़ा देंगे.

दिलवाओ हमें फांसी, ऐलान से कहते हैं,
ख़ूं से ही हम शहीदों के, फ़ौज बना देंगे.

मुसाफ़िर जो अंडमान के, तूने बनाए, ज़ालिम,
आज़ाद ही होने पर, हम उनको बुला लेंगे.

इसे भी पढ़ें: एक चादर के कारण चार क्रांतिकारियों को हुई थी फांसी की सजा

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ के विचार (Ashfaqulla Khan Thoughts)

हम भारतमाता के रंगमंच पर अपना पार्ट अदा कर चुके हैं. हमने गलत अथवा सही जो कुछ भी किया, वह स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना से किया. कुछ लोग हमारे इस काम की प्रशंसा भी करेंगे और कुछ लोग निंदा. किन्तु हमारे साहस और वीरता की प्रशंसा हमारे दुश्मनों तक को करनी पड़ेगी.

मैं अंग्रेजों के राज्य से हिन्दू राज्य ज्यादा पसंद करूँगा.

मेरे हाथ इंसानी खून से कभी नहीं रंगे, मेरे ऊपर जो इल्जाम लगाया गया, वह गलत है. खुदा के यहाँ मुझे इन्साफ मिलेगा.

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हमें नाम पैदा करना तो है नहीं. यदि नाम पैदा करना होता तो क्रांतिकारी वाला काम छोड़ देता और लीडरी न करता.

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