महेंद्र सूरी का जीवन परिचय | Mahendra Suri Biography Hindi

Mahendra Suri Biography Hindi दोस्तों आज तक आपने भारत के सबसे बड़े खगोलशास्त्री आर्यभट्ट के बारे में तो कई बार सुना होगा.

परन्तु आज हम आपको भारत के पहले ऐसे खगोलशास्त्री के बारे में बताने जा रहे हैं जिसने पहली बार भारत में खगोलशास्त्र पर अध्ययन किया था.

महेंद्र सूरी का जीवन परिचय (Mahendra Suri Biography Hindi)

जन्म – 1340 ईसवी
मृत्यु – 1410 ईसवी

महेंद्र सूरी 14वी सदी के प्रख्यात जैन खगोलज्ञ थे, जो अपनी एक प्रसिद्ध रचना यंत्रराजा (Yantraraja) जो यंत्र (Astrolabe) पर लिखी गई पहली भारतीय रचना थी.

महेंद्र सूरी के पिता का नाम दयाशंकर सूरी था और उनकी माता विमला थी. उनकी पत्नी का नाम उर्मिला था और उनकी चार बेटियाँ थी.

वह मदन सूरी के शिष्य थे और महेंद्र सूरी जैन थे. जैन समाज का उदय 6वी शताब्दीपूर्व के आसपास माना जाता हैं.

जैन समाज उस वक़्त देश का एक प्रमुख और प्रभावशाली समाज था. खासकर खगोल विज्ञान के क्षेत्र में इनका खास प्रभुत्व था.

लेकिन वक़्त के साथ धीरे-धीरे बाहरी आक्रान्ताओ के कारण जैनियो का प्रभाव कम होने लगा.

महेंद्र सूरी के वक़्त (14 वी शताब्दी) इस्लाम का वर्चस्व था.

इस्लामिक विचारधारा धीरे-धीरे भारतीय समाज मे अपनी जगह बना रहे थी.

उस वक़्त फ़िरोज़शाह तुगलक दिल्ली का शासक था, जो खगोल विज्ञान में गहरी रुचि रखता था.

इसके अलावा वह भारतीय सभ्यता और इस्लामिक सभ्यता के आदान-प्रदान का भी पक्षधर था. वह इस्लामिक विचारधाराओं को संस्कृत में लिखवाकर इसे भारतीय समाज के बीच रखता था.

खगोल विज्ञान में खास रुचि होने के कारण फ़िरोज़शाह तुगलक ने महेंद्र सूरी को यंत्र (Astrolabe) पढ़ने के लिए प्रेरित किया जो कि एक इस्लामिक दुनिया की रचना थी. उसका मकसद भारतीय खगोल विज्ञानियों को यंत्रो से परिचित कराना था.

तत्पश्चात महेंद्र सूरी ने एक रचना का गहन अध्ययन किया, और उसके बाद इस रचना का संस्कृत में लेखन किया जो यंत्र में लिखा गया पहला भारतीय ग्रंथ है, जिसे Yantraraja (1370 ई.) के नाम से जाना जाता हैं.

इसके पश्चात महेंद्र सूरी ही यह रचना कई खगोलविदों के लिए आधार बनी. जिसमे पद्मनाभा द्वारा रचित यंत्रराजा-अधिकारा (Yantraraja-Adhikara) एक प्रमुख रचना हैं.

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यंत्रराज के बारे में जानकारी (Mahendra Suri Yantraraj)

182 चरणों वाला यंत्रराज पहले अध्याय से ही यंत्र के बारे में बताना आरंम्भ करता हैं. इसमे कुछ आधारभूत सूत्रों का उल्लेख हैं.

इसके अलावा कुछ संख्यात्मक सारणी का भी वर्णन है जो यंत्र की डिज़ाइन में मदद करती हैं. इसमे 32 stars के अक्षांश और देशांतर का भी वर्णन हैं.

यदि पूरी यंत्रराज का बात करे तो यह ग्रंथ पांच अध्यायों में बंटा हुआ हैं, जो इस प्रकार हैं:-

अध्याय 1:-

इस अध्याय को गणित अध्याय के नाम से जानते हैं. इस अघ्याय में त्रिकोणमिति से जुड़ी हुई ऐसी बातों का उल्लेख हैं, जो यंत्र के निर्माण में सहायक होती हैं.

अध्याय 2:-

यंत्रघाटनाध्याय के नाम से इसे जाना जाता हैं. इस अध्याय में यंत्र से जुड़े हुए विभिन्न हिस्सों की बात बताई गई हैं.

अध्याय 3:-

यंत्रार्चनाध्याय अध्याय में यंत्र से जुड़े हुए प्रमुख घटक और यंत्र को बनाने की विधि बताई गई हैं.

अध्याय 4:-

यंत्रशोधनध्याय अध्याय इस बात का अध्ययन करता हैं की जो यंत्र बना हुआ हैं, वो सही काम कर रहा हैं, या नही.

जिस उद्देश्य को लेकर इसे बनाया गया था , क्या उस पर अमल कर पा रहा हैं, या नही.

अध्याय 5:-

यंत्रविकारणाध्यय अध्याय ग्रंथ का अंतिम अध्याय हैं. इस अध्याय में यंत्र का उपयोग करने से संबंधित जानकारियां दी गई हैं.

यंत्र के द्वारा खगोलीय घटनाओं को देखा जाता हैं. इसके अलावा बहुत सी गणितीय समस्याओं खासकर त्रिकोणमिति से जुड़ी बातो का का इस अध्याय के उल्लेख किया गया हैं.

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Shashank Sharma

Shashank Sharma

शशांक दिल से देशी वेबसाइट के कंटेंट हेड और SEO एक्सपर्ट हैं और कभी कभी इतिहास से जुडी जानकारी पर लिखना पसंद करते हैं.

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