अटल बिहारी वाजपेयी की 20 अनमोल कविताएँ | Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi

भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी की अनमोल कविताएँ का संग्रह | All Poems of Atal Bihari Vajpayee in Hindi

अटल बिहारी वाजपेयी एक हस्ती है जिन्हें देश का बच्चा बच्चा जानता है. इनके विचार देश की युवा पीढ़ी  को बहुत प्रेरित करते है. उन्होंने हमेशा जीवन की चुनौतियों का डट कर सामना किया. उनकी कविताएं लोगों को प्रेरित करने के साथ मन को भी मोह लेती है. आइए जानते है अटल जी की कुछ कविताएं जो पत्थर में भी जान फूंक देती है.

अटल बिहारी की कविताएँ (Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi)

#1. आओ फिर से दिया जलाएँ

आओ फिर से दिया जलाएँ

भरी दुपहरी में अंधियारा

सूरज परछाई से हारा

अंतरतम का नेह निचोड़ें-

बुझी हुई बाती सुलगाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ…

हम पड़ाव को समझे मंज़िल

लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल

वतर्मान के मोहजाल में-

आने वाला कल न भुलाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ…

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा

अपनों के विघ्नों ने घेरा

अंतिम जय का वज़्र बनाने-

नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ…

#2. मौत से ठन गई 

ठन गई..

मौत से ठन गई..

जूझने का मेरा इरादा न था,

मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,

यों लगा ज़िंदगी से बड़ी हो गई

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,

ज़िंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,

लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,

सामने वार कर फिर मुझे आज़मा

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,

शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,

दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,

न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,

आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,

नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,

देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई

मौत से ठन गई..

#3. क़दम मिला कर चलना होगा

बाधाएँ आती हैं आएँ

घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,

पावों के नीचे अंगारे,

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,

निज हाथों में हँसते-हँसते,

आग लगाकर जलना होगा..

क़दम मिलाकर चलना होगा..

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,

अगर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,

अपमानों में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना,

पीड़ाओं में पलना होगा..

क़दम मिलाकर चलना होगा..

उजियारे में, अंधकार में,

कल कहार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत प्यार में,

क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

जीवन के शत-शत आकर्षक,

अरमानों को ढलना होगा..

क़दम मिलाकर चलना होगा..

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,

प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,

असफल, सफल समान मनोरथ,

सब कुछ देकर कुछ न मांगते,

पावस बनकर ढ़लना होगा..

क़दम मिलाकर चलना होगा..

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,

प्रखर प्यार से वंचित यौवन,

नीरवता से मुखरित मधुबन,

परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,

जलना होगा, गलना होगा..

क़दम मिलाकर चलना होगा..

#4. गीत नहीं गाता हूँ

गीत नहीं गाता हूँ..

बेनक़ाब चेहरे हैं

दाग़ बड़े गहरे हैं 

टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ

गीत नहीं गाता हूँ..

लगी कुछ ऐसी नज़र

बिखरा शीशे सा शहर

अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ

गीत नहीं गाता हूँ..

पीठ मे छुरी सा चांद

राहू गया रेखा फांद

मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूँ

गीत नहीं गाता हूँ..

#5. हरी हरी दूब पर 

हरी हरी दूब पर

ओस की बूंदे

अभी थी,

अभी नहीं हैं..

ऐसी खुशियाँ

जो हमेशा हमारा साथ दें

कभी नहीं थी,

कहीं नहीं हैं..

क्काँयर की कोख से

फूटा बाल सूर्य,

जब पूरब की गोद में

पाँव फैलाने लगा,

तो मेरी बगीची का

पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,

मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ

या उसके ताप से भाप बनी,

ओस की बुँदों को ढूंढूँ?

सूर्य एक सत्य है

जिसे झुठलाया नहीं जा सकता

मगर ओस भी तो एक सच्चाई है

यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है

क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ?

कण-कण मेँ बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ?

सूर्य तो फिर भी उगेगा,

धूप तो फिर भी खिलेगी,

लेकिन मेरी बगीची की

हरी-हरी दूब पर,

ओस की बूंद

हर मौसम में नहीं मिलेगी..

#6. ऊंचाई

ऊँचे पहाड़ पर,

पेड़ नहीं लगते,

पौधे नहीं उगते,

न घास ही जमती है।

जमती है सिर्फ बर्फ,

जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,

मौत की तरह ठंडी होती है।

खेलती, खिलखिलाती नदी,

जिसका रूप धारण कर,

अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है

#7.मनाली मत जइयो

मनाली मत जइयो, गोरी

राजा के राज में

जइयो तो जइयो,

उड़िके मत जइयो,

अधर में लटकीहौ,

वायुदूत के जहाज़ में

जइयो तो जइयो,

सन्देसा न पइयो,

टेलिफोन बिगड़े हैं,

मिर्धा महाराज में

जइयो तो जइयो,

मशाल ले के जइयो,

बिजुरी भइ बैरिन

अंधेरिया रात में

जइयो तो जइयो,

त्रिशूल बांध जइयो,

मिलेंगे ख़ालिस्तानी,

राजीव के राज में

मनाली तो जइहो

सुरग सुख पइहों

दुख नीको लागे, मोहे

राजा के राज में

#8. कौरव कौन??

कौरव कौन

कौन पांडव,

टेढ़ा सवाल है|

दोनों ओर शकुनि

का फैला

कूटजाल है|

धर्मराज ने छोड़ी नहीं

जुए की लत है|

हर पंचायत में

पांचाली

अपमानित है|

बिना कृष्ण के

आज

महाभारत होना है,

कोई राजा बने,

रंक को तो रोना है|

#9. दूध में दरार पड़ गई.

खून क्यों सफेद हो गया?

भेद में अभेद खो गया.

बंट गये शहीद, गीत कट गए,

कलेजे में कटार दड़ गई.

दूध में दरार पड़ गई.

खेतों में बारूदी गंध,

टूट गये नानक के छंद

सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है.

वसंत से बहार झड़ गई

दूध में दरार पड़ गई.

अपनी ही छाया से बैर,

गले लगने लगे हैं ग़ैर,

ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता.

बात बनाएं, बिगड़ गई.

दूध में दरार पड़ गई.

#10. सच्चाई यह है कि…

सच्चाई यह है कि

केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,

सबसे अलग-थलग,

परिवेश से पृथक,

अपनों से कटा-बँटा,

शून्य में अकेला खड़ा होना,

पहाड़ की महानता नहीं,

मजबूरी है।

ऊँचाई और गहराई में

आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,

उतना एकाकी होता है,

हर भार को स्वयं ढोता है,

चेहरे पर मुस्कानें चिपका,

मन ही मन रोता है।

ज़रूरी यह है कि

ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,

जिससे मनुष्य,

ठूँठ सा खड़ा न रहे,

औरों से घुले-मिले,

किसी को साथ ले,

किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना,

यादों में डूब जाना,

स्वयं को भूल जाना,

अस्तित्व को अर्थ,

जीवन को सुगंध देता है।

#11. झुक नहीं सकते

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

सत्य का संघर्ष सत्ता से

न्याय लड़ता निरंकुशता से

अंधेरे ने दी चुनौती है

किरण अंतिम अस्त होती है

दीप निष्ठा का लिये निष्कंप

वज्र टूटे या उठे भूकंप

यह बराबर का नहीं है युद्ध

हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध

हर तरह के शस्त्र से है सज्ज

और पशुबल हो उठा निर्लज्ज

किन्तु फिर भी जूझने का प्रण

अंगद ने बढ़ाया चरण

प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार

समर्पण की माँग अस्वीकार

दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

#12. क्षमा करो बापू 

क्षमा करो बापू! तुम हमको,

बचन भंग के हम अपराधी,

राजघाट को किया अपावन,

मंज़िल भूले, यात्रा आधी।

जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,

टूटे सपनों को जोड़ेंगे।

चिताभस्म की चिंगारी से,

अंधकार के गढ़ तोड़ेंगे।

#13. सामने वार कर फिर मुझे आज़मा

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,

सामने वार कर फिर मुझे आज़मा

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,

शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,

दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,

न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,

आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,

नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,

देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

सामने वार कर फिर मुझे आज़मा..

#14. न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

सवेरा है मगर पूरब दिशा में

घिर रहे बादल

रूई से धुंधलके में

मील के पत्थर पड़े घायल

ठिठके पाँव

ओझल गाँव

जड़ता है न गतिमयता

स्वयं को दूसरों की दृष्टि से

मैं देख पाता हूं

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

समय की सदर साँसों ने

चिनारों को झुलस डाला,

मगर हिमपात को देती

चुनौती एक दुर्ममाला,

बिखरे नीड़,

विहँसे चीड़,

आँसू हैं न मुस्कानें,

हिमानी झील के तट पर

अकेला गुनगुनाता हूँ।

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

#15. मैं अखिल विश्व का गुरु महान 

मैं अखिल विश्व का गुरु महान 

देता विद्या का अमर दान,

मैंने दिखलाया मुक्ति मार्ग,

मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान,

मेरे वेदों का ज्ञान अमर,

मेरे वेदों की ज्योति प्रखर,

मानव के मन का अंधकार 

क्या कभी सामने सका ठहर?

मेरा स्वर नभ में घहर-घहर,

सागर के जल में छहर छहर,

इस कोने से उस कोने तक 

कर सकता जगती सौरभ भय

#16. जीवन की ढलने लगी साँझ 

जीवन की ढलने लगी सांझ

उमर घट गई

डगर कट गई

जीवन की ढलने लगी सांझ।

बदले हैं अर्थ

शब्द हुए व्यर्थ

शान्ति बिना खुशियाँ हैं बांझ।

सपनों में मीत

बिखरा संगीत

ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।

जीवन की ढलने लगी सांझ।

#17. मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना

न वसंत हो, न पतझड़,

हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,

मात्र अकेलेपन का सन्नाटा..

मेरे प्रभु!

मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,

ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,

इतनी रुखाई कभी मत देना..

मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना..

#18. राह कौन सी जाऊं मैं

चौराहे पर लुटता चीर 

प्यादे से पिट गया वजीर 

चलू आखिरी चाल की बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊ?

राह कौन सी जाऊ मैं…

सपना जन्मा और मर गया

मधु ऋतु में भी बाग झर गया

तिनके टूटे हुए बटोरु या नवसृष्टि सजाऊ में?

राह कौन सी जाऊ मैं…

2 दिन मिले उधार में

घाटों के व्यापार में

श्रण श्रण का हिसाब लू या निधि शेष लोटाऊ में? 

राह कौन सी जाऊ मैं…

#19. हिरोशिमा की पीड़ा

किसी रात को

मेरी नींद चानक उचट जाती है

आँख खुल जाती है

मैं सोचने लगता हूँ कि

जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का

आविष्कार किया था

वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण

नरसंहार के समाचार सुनकर

रात को कैसे सोए होंगे?

क्या उन्हें एक क्षण के लिए सही

ये अनुभूति नहीं हुई कि

उनके हाथों जो कुछ हुआ

अच्छा नहीं हुआ!

यदि हुई, तो वक़्त उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करेगा

किन्तु यदि नहीं हुई तो इतिहास उन्हें

कभी माफ़ नहीं करेगा!

#20. पुनः चमकेगा दिनकर 

आजादी का दिन मना,

नई गुलामी बीच..

सुखी धरती, सुना अम्बर,

मन- आँगन में कीच 

मन- आँगन में कीच..

कमल सारे मुरझाए,

एक एक कर बुझे दीप,

अंधियारे छाए..

कह कैदी कबिराय

न अपना छोटा जी कर, 

चीर निशा का वश

पुनः चमकेगा दिनकर 

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