चन्द्रशेखर वेंकटरमन का जीवन परिचय | C V Raman Biography In Hindi

चन्द्रशेखर वेंकटरमन का जीवन परिचय

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चंद्रशेखर वेंकटरमन एक महान वैज्ञानिक थे जिन्होंने भौतिक विज्ञान क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया है. वह पहले भारतीय थे जिन्हे भौतिकी विषय में 1930 में प्रकाश के प्रकीर्णन जिसका नाम उनके नाम पर रखा गया है और “रमन इफेक्ट” की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. वे ग्लेशियर के नीले रंग से बहुत प्रभावित थे और समुद्र के नीले पानी के रहस्य को हल करना चाहते थे इसीलिए उन्होंने “प्रकाश के बिखरने” के विषय में कई लगातार प्रयोग किए और उन्होंने इसे सुलझाया और  वही आज “रमन इफ़ेक्ट” या “रमन प्रभाव” के नाम से जाना जाता है. चलिए इस महान वैज्ञानिक के जीवनी को जानने और समज़ने की कोशिश करते है.   

चन्द्रशेखर वेंकटरमन का जीवन परिचय | C V Raman Biography in Hindi

बिंदु (Points)जानकारी (Information)
नाम (Name)चन्द्रशेखर वेंकटरमन
प्रचलित नाम (Nick Name)C V Raman
जन्म (Date of Birth)07/11/1888
आयु 70 वर्ष
जन्म स्थान (Birth Place)तिरुचिरापल्‍ली, तमिलनाडु
पिता का नाम (Father Name)चंद्रशेखर अय्यर
माता का नाम (Mother Name)पार्वती
पत्नी का नाम (Wife Name)ज्ञात नहीं
पेशा (Occupation )वैज्ञानिक
बच्चे (Children)ज्ञात नहीं
मृत्यु (Death)21/11/1970
मृत्यु स्थान (Death Place)बेंगलोर
भाई-बहन (Siblings)ज्ञात नहीं
अवार्ड (Award)नोबेल पुरस्कार

जन्म और प्रारंभिक जीवन ( C V Raman Birth & Education )

चन्द्रशेखर वेंकटरामन का जन्म 7 नवंबर 1888 में तमिलनाडु के तिरुचिरापल्‍ली में हुआ. उनके पिता आर चंद्रशेखर अय्यर और माता पार्वती थे. उनके पिता एक अध्यापक थे जो बाद में  विशाखापट्टनम कॉलेज में गणित  और भौतिक  विज्ञान के लेक्चरर बने. इनकी प्रारम्भिक शिक्षा विशाखापत्तनम में ही हुई. वह बहुत ही बुद्धिमान विद्यार्थी थे और मात्र 11 वर्ष की आयु में ही उन्होंने अपनी मैट्रिक की पढ़ाई पूरी कर ली थी. वे बहुत ही कम उम्र से भौतिक विज्ञान की ओर आकर्षित थे. 1903 में उन्होंने चेन्नई के  प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश ले लिया. वे बी.ए. की परीक्षा में विश्वविद्यालय में प्रथम श्रेणी में आए. उन्हें भौतिकी में स्वर्णपदक दिया गया. इन्होने 1907 में मद्रास विश्वविद्यालय से गणित में प्रथम श्रेणी में एमए की डिग्री हासिल की. 

जीवन सफ़र (C V Raman Life Journey & Inventions)

पिता द्वारा आग्रह करने पर वे भारत सरकार के वित्त विभाग की प्रतियोगिता में बैठ गए. रमन जी ने इस परीक्षा में टॉप किया और साल 1907 में उन्होंने भारतीय वित्त विभाग में सहायक लेखाकार जनरल के रूप में जॉइन किया. परंतु तब भी उनका  दिल-ओ-दिमाग  तो अपने अनुसंधान के ऊपर ही बना हुआ था इसीलिए उन्होंने  खाली समय में इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन में शोध शुरू किया. 1917 में उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर की पेशकश की गई थी. और उन्होंने यह अवसर को स्वीकार किया. 15 वर्ष तक नौकरी करने के बाद वे  बैंगलोर में भारतीय विज्ञान संस्थान में भौतिकी के प्रोफेसर के रूप में कार्यरत रहे. उन्होंने चुंबकीय आकर्षण और संगीत वाद्ययंत्र के सिद्धांत के क्षेत्र में भी काम किया.  

1921 में वेंकटरमन को ऑक्सफोर्ड, इंग्लैंड से विश्वविद्यालयीन कांग्रेस में भाग लेने के लिए निमंत्रण प्राप्त हुआ. वहाँ उनकी मुलकात लार्ड रदरफोर्ड, जे. जे. थामसन जैसे विश्वविख्यात वैज्ञानिकों से हुई. इंग्लैंड से भारत लौटते समय एक अनपेक्षित घटना के कारण “रमन प्रभाव” की खोज के लिए प्रेरणा मिली. तमाम प्रयोगों के बाद वेंकटरमन अपनी उस खोज पर पहुँचे, जो ‘रमन प्रभाव’ नाम से विश्वविख्यात है. 

रमन प्रभाव (रमन इफ़ेक्ट) की व्याख्या क्या है ? 

रमन प्रभाव की व्याख्या केवल क्वांटम सिद्धांत के आधार पर की जा सकती है, जहां एकवर्णी प्रकाश पुंज को ऊर्जा युक्त कणों के प्रवाह के रूप में देखा जाता है.  ये फोटॉन जब माध्यम के कणों से टकराते हैं तो उनमें या तो प्रत्यास्थ संघट्ट होता है जिससे अनिवार्यतः आपतित आवृत्ति की ही तरंगें उत्सर्जित होती हैं या फिर अप्रत्यास्थ संघट्ट होता है जिससे आपतित विकिरणों से अधिक तरंगदैर्ध्य की स्पेक्ट्रमी रेखाएं  भी प्राप्त हो सकती हैं और कम तरंगदैर्ध्य की स्पेक्ट्रमी रेखाएं  भी. अप्रत्यास्थ संघट्ट से प्राप्त विकिरणों का प्रक्रम रमन प्रकीर्णन कहलाता है और इसके परिणामस्वरूप प्राप्त स्पेक्ट्रमी रेखाएं “रमन रेखाएं” कहलाती हैं. 

सम्मान और पुरस्कार ( C V Raman Honors and Awards )

  • वर्ष 1924 में वे अनुसंधानों के लिए रॉयल सोसायटी, लंदन के फैलो बनाए गए. 
  • 1930 में  भौतिक  विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सन्मानित किया गया.
  • वर्ष 1957 में लेनिन शान्ति पुरस्कार भी प्रदान किया था. 
  • २८ फरवरी १९२८ को चन्द्रशेखर वेंकट रामन् ने रामन प्रभाव की खोज की थी जिसकी याद में भारत में इस दिन को प्रत्येक वर्ष ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ के रूप में मनाया जाता है.

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