सदाचार पर निबंध | Essay on Sadachar in Hindi

सदाचार विषय पर हिंदी भाषा में निबंध | Essay on Sadachar (Good Behavior) in Hindi | Sadachar par Nibandh Hindi me

सदाचार शब्द संस्कृत के सत् और आचार शब्दों से मिलकर बना है. इसका अर्थ है सज्जन का आचरण अथवा शुभ आचरण. सत्य, अहिंसा, ईश्वर विश्वास, मैत्री भाव, महापुरुषों का अनुसरण करना आदि बाते सदाचार में गिनी जाती है. इस सदाचार को धारण करने वाला व्यक्ति सदाचारी कहलाता है. इसके विपरीत आचरण करने वाले व्यक्ति को दुराचारी कहते हैं.

सदाचार मनुष्य का लक्षण है. सदाचार को धारण करना मानवता को प्राप्त करना है. सदाचारी व्यक्ति समाज में पूजित होता है. आचारहीन का कोई भी सम्मान नहीं करता हैं. कोई भी उसका साथ नहीं देता हैं. वेद भी उनका कल्याण नहीं करते हैं इसलिए कहा गया है “आचारहीनं पुर्नान्त्ते वेदाः” अर्थात वेद भी आचार रहित व्यक्ति का उद्धार नहीं कर सकते हैं.

सच्चरित्रता

सदाचार का महत्व पूर्ण सच्चरित्रता है. सच्चरित्रता सदाचार का सर्वोत्तम साधन है. अंग्रेजी कहावत के अनुसार धन नष्ट हो जाए तो मनुष्य की विशेष हानि नहीं होती है. स्वास्थ्य बिगड़ जाने पर कुछ हानि होती है किंतु चरित्रहीन होने पर मनुष्य का सर्वस्व नष्ट हो जाता है. मनुष्य में जो कुछ भी मनुष्यत्व है, उसका प्रतिबिंब उसका चरित्र है. आचारहीन व्यक्ति तो निरा पशु या राक्षस के समान है. रावण के पास भी धन, वैभव और विद्या सब कुछ था किंतु अनाचार के कारण उसका सब कुछ नष्ट हो गया. महाभारत की एक कथा के अनुसार एक राजा का शील नष्ट हुआ तो उसका धर्म नष्ट हो गया. यस और लक्ष्मी उसका साथ छोड़ गए. भारत एवं पाश्चात्य के सभी विद्वानों ने शील, सदाचार और सच्चरित्रता को जीवन में सर्वाधिक महत्व दिया है.

सच्चरित्रता के लिए यह आवश्यक है कि भय की प्रवृत्ति पर नियंत्रण प्राप्त किया जाए तभी हमारे ह्रदय में ऊँचे आदर्श और स्वस्थ प्रेरणाएं पनप सकती हैं. जो भय के वश में होगा उसके चरित्र का विकास नहीं हो सकता हैं. जीवन में अच्छे चारित्रिक गुणों के विकास हेतु यह आवश्यक है कि स्वयं को बुरे वातावरण से दूर रखा जाए. अपने चरित्र निर्माण हेतु सदैव भले और बुद्धिमान लोगों का संगत करना चाहिए. बुरे लोगों का साथ छोड़कर अच्छे विचार मन में अनुग्रहित करना चाहिए. आदर्श चरित्र के लिए मन, वचन, और कर्म की एकरूपता का होना भी आवश्यक है. चरित्रवान व्यक्ति की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं होता हैं. वे परोपदेशक नहीं होते हैं.

धर्म की प्रधानता

भारत एक आध्यात्मिक देश है. यहां की संस्कृति तथा सभ्यता धर्म प्रधान है. धर्म से मनुष्य की लौकिक एवं आध्यात्मिक उन्नति होती है. लोक और परलोक की भलाई धर्म से ही संभव है. धर्म आत्मा की उन्नति करता है उसे पतन की ओर ले जाने से रोकता है. इस प्रकार धर्म सदाचार का ही पर्यायवाची भी कहा जा सकता है. सदाचार में वह गुण है जो धर्म हमें हैं. सदाचार के आधार पर ही धर्म की स्थिति संभव है. जो आचरण मनुष्य को ऊंचा उठाया उसे चरित्रवान बनाए वह धर्म है वही सदाचार है. महाभारत में कहा गया है धर्म की उत्पत्ति आचार्य से ही होती है. शील, सत्य, भाषण, अहिंसा, क्षमा, करुणा और परोपकार जिनके सदाचार कहा जाता हैं, वही धर्म के प्रमुख गुण हैं. अतः सदाचार को धारण करना ही धर्म को धारण करना हैं.

शील सदाचार की शक्ति

शील मानसिक भूचाल के लियें अंकुश हैं. सदाचार मनुष्य की काम, क्रोध, मोह आदि बुराइयों से रक्षा करता है. अहिंसा की भावना सेमन की क्रूरता समाप्त होती है तथा उसमें करुणा, सहानुभूति एवं दया की भावना जागृत होती है. क्षमा, सहनशीलता आदि गुणों से मनुष्य का नैतिक उत्थान होता है तथा मनुष्य से लेकर पशु-पक्षी तक के प्रति उदारता की भावना पैदा होती है. इस प्रकार सदाचार का गुण धारण करने से मनुष्य का चरित्र उज्जवल होता है और उसमें कर्तव्यनिष्ठा पैदा होती है.

संपूर्ण गुणों का सार

सदाचार मनुष्य के संपूर्ण गुणों का सार है. जो उसके जीवन को सार्थकता प्रदान करता है. इसकी तुलना में विश्व का कोई भी मूल्यवान वस्तु नहीं टिक सकती है. सदाचार रहित व्यक्ति कभी पूजनीय नहीं हो सकता है. सदाचार ही मनुष्य को पूज्य बनाता है. सदाचार के बिना मनुष्य कभी भी अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता है. सत्य भाषण, उदारता, विशिष्टता, विनम्रता, सुशीलता, सहानुभूति आदि गुण जिस व्यक्ति में होते हैं, वह सदाचारी कहलाता है. उस व्यक्ति की समाज में प्रतिष्ठा होती है. उसे समाज ने आदर और सम्मान मिलता हैं.

उपसंहार(Conclusion)

वर्तमान युग में शिक्षा के प्रभाव से भारत के युवक-युवतियां सदाचार के महत्व को निरर्थक मानने लगे हैं तथा सदाचार विरोधी जीवन को अपना आदर्श मानते हैं. इसी कारण देश तथा समाज पतन की ओर जा रहा है. आसन की रक्षा हेतु युवा वर्ग को सचेत रहना चाहिए. उन्हें राम कृष्ण और गांधी के चरित्र को आदर्श मानकर न्यायप्रिय आचरण करना चाहिए. राष्ट्र का सच्चा निर्माण, सच्ची प्रगति तभी संभव है, जब प्रत्येक भारतवासी सदाचारी बनने का संकल्प लें.

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