पृथ्वी पर ऋतु परिवर्तन के पीछे का विज्ञान और सूर्य की स्थिति | Season Changing on Earth in Hindi

ऋतु परिवर्तन : धरती पर दो प्रमुख ऋतुओं – ग्रीष्म व शीत के सृजन का कारण |
Season Changing on Earth in Hindi

जैसे दिन-रात का परिवर्तन होता है, कुछ वैसे ही ग्रीष्म-शीत ऋतु परिवर्तन होता है। अर्थात, ‘दिवस (24 घंटे)’ के ‘दोपहर’ के समय की तुलना, आप ‘वर्ष (12 माह)’ के ‘ग्रीष्म ऋतु’ के भाग से कर सकते हैं। और ‘दिवस’ की ‘मध्यरात्रि’ की तुलना, आप ‘वर्ष’ के ‘शीत’ ऋतु के भाग से कर सकते हैं।

धरती का जो भाग ‘सूर्य के सामने’ रहता है उस भाग में दिवस के उजाले का समय रहता है, इसी प्रकार, धरती का जो भाग ‘सूर्य की तरफ झुका’ रहता है वहां ग्रीष्म ऋतु के आसपास का काल चलता रहता है। आइये इसे और स्पष्टता से समझने का प्रयास करते हैं!

ऋतु परिवर्तन समझने के लिए कुछ महत्वपुर्ण तथ्य :-

पृथ्वी का आकार : अंडाकार ना कि गोलाकार –

धरती मध्य से थोड़ी सी चपटी हैं। इसलिए धरती के आकार को अंडाकार (स्फिरोइड / Spheroid) कहते है, ना कि गोलाकार (स्फियर / Sphere या स्फेरिकल / Spherical)। अर्थात बोलचाल में हम धरती के आकार की तुलना क्रिकेट, टेनिस या फुटबाल की गोल गेंद से करते हैं, पर वास्तव में – सैद्धांतिक रुप से – धरती कुछ-कुछ तरबुज या थोड़े से चपटे आटे के लोए के जैसी रहती है।

पृथ्वी की चाल : अपने स्थान पर घुमना और सूर्य की परिक्रमा –

धरती किसी लट्टू की तरह अपने स्थान पर – अपनी धूरी पर – 24 घंटे (1 दिन) में एक बार घूमती है। और जैसे हम मंदिर में भगवान की परिक्रमा करते हैं, कुछ वैसे ही धरती सूर्य की एक परिक्रमा 365 दिन (1 वर्ष) में पुरी करती है। इसप्रकार, अंतरिक्ष में पृथ्वी कुछ-कुछ वैसे ही चलती है जैसे एक पटाखे वाली चकरी चलती है। धरती की अपने स्थान पर घुमने की ‘धूरी’ वो काल्पनिक रेखा है जो धरती के उत्तरी ध्रुव व दक्षिणी ध्रुव को जोड़ती है।

पृथ्वी का झुकाव या तिरछी स्थिति :-

धरती पुरी सूर्य-परिक्रमा के दौरान, प्रत्येक स्थान पर, हमेशा एक ही तरफ 23.4 डिग्री के कोण पर ‘झुकी’ रहती है। और इस ‘झुकी’ अवस्था में ही अपने स्थान पर घुमती रहती है।

जब आप नाखुन अपनी ओर रखते हुए अपने हाथ से ‘वी/V फॉर विक्टरी/विजय’ का साइन/चिन्ह दिखाते है, तब आपकी ‘सीधी/खड़ी’ तर्जनी उंगली (अंगुठे के पास की उंगली) की तुलना में मध्यमा उंगली (मध्य की उंगली) ‘टेढ़ी/तिरछी/झुकी’ हुई रहती है। धरती की अपने स्थान पर घुमने की धूरी की रेखा की स्थिति, विक्टरी-साइन के समय की मध्यमा उंगली की स्थिति के समान ‘टेढ़ी/तिरछी/झुकी’ रहती है, ना की ‘सीधी/खड़ी’ तर्जनी उंगली के समान रहती है।

ऐसे ही, पानी की बाल्टी से जब आपको किसी और बर्तन में पानी डालना होता है, तब आप ‘सीधी/खड़ी’ बाल्टी को थोड़ा ‘टेढ़ा/तिरछा/झुकाना’ करते हैं। अंतरीक्ष में धरती की स्थिति भी एक झुकी/टेढ़ी बाल्टी की तरह रहती है, ना कि सीधी/खड़ी बाल्टी की तरह रहती है।

एक और तरीके से वस्तुस्थिति प्रस्तुत करे तो, यदी एक ए4 (A4) साइज के कागज पर आप धरती का चित्र बनाएंगे, तो सबसे पहले आपको कागज की लंबाई के समानांतर (पेरेलल) एक सीधी/खड़ी रेखा (आपकी दृष्टि में परपेन्डिक्यूलर) खींचनी होगी। इसके बाद इस सीधी खड़ी रेखा के साथ पृथ्वी की धूरी की रेखा 23.4 डिग्री के कोण पर बनानी होगी। फिर धूरी को केंद्र में रखकर धरती का अंडाकार आकार खींचना होगा।

इसप्रकार सूर्य-परिक्रमा के दौरान अंडाकार धरती टेढ़ी या झुकी अवस्था में, अपनी धूरी पर – अपने स्थान पर, घुमती रहती है।

धरती के भाग : ‘उत्तरी गोलार्ध व दक्षिणी गोलार्ध’ तथा ‘पश्चिमी गोलार्ध व पुर्वी गोलार्ध’

धरती की सतह पर ठीक मध्य-भाग से जाने वाली काल्पनिक लेटी/आड़ी भूमध्य रेखा (इक्वेटर / Equator) के आधार पर धरती को दो बराबर के भागों में देखा जा सकता है –

  • 1) उत्तरी गोलार्ध (नॉर्दन हेमिस्फियर / Northern Hemisphere) – भूमध्य रेखा के उत्तर की तरफ स्थित धरती का आधा भाग। अर्थात, धरती का उपरी आधा भाग।
  • 2) दक्षिणी गोलार्ध (सदर्न हेमिस्फियर / Southern Hemisphere) – भूमध्य रेखा के दक्षिण की तरफ स्थित धरती का आधा भाग, अर्थात, धरती का नीचला आधा भाग।- हमारा भारत देश धरती के उत्तरी-गोलार्ध में स्थित हैं।

इसी तरह, धरती को एक और दृष्टि से दो भागों में देखा जाता है। धरती की सतह पर ठीक मध्य-भाग से जाने वाली काल्पनिक लंबवत/खड़ी ‘प्रधान मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरीडियन / Prime Meridian)’ के आधार पर भी धरती को दो बराबर भागों में देखा जा सकता है –

  • 3) पश्चिमी गोलार्ध (वेस्टर्न हेमिस्फियर / Western Hemisphere) – प्राइम मेरीडियन रेखा के पश्चिम की तरफ का धरती का आधा भाग। सामान्य भाषा में, उल्टे हाथ की ओर का धरती का आधा भाग।
  • 4) पुर्वी गोलार्ध (इस्टर्न हेमिस्फियर / Eastern Hemisphere) – प्राइम मेरीडियन रेखा के पूर्व की तरफ का धरती का आधा भाग। सामान्य भाषा में, सीधे हाथ की ओर का धरती का आधा भाग।- यह तथ्य प्रसिद्ध है कि प्राइम-मेरीडियन रेखा लंदन के ग्रीनवीच से होकर गुजरती है, इसपर लोन्जीट्युड का माप ‘0’ डीग्री रहता है, और धरती के किसी भी स्थान पर समय निर्धारण से इसका करीबी संबंध है।

दिन और रात का विज्ञान

दिन और रात होने का कारण धरती का अपनी धूरी पर घूमना है। अपनी धुरी पर घुमते समय धरती का जो भाग सूर्य की तरफ आ जाता है वहां दिन हो जाता है और बाकि भाग में रात्रि हो जाती है।

प्रत्यक्ष अनुभूति :-
जब, ‘पुर्वी गोलार्ध’ का क्षेत्र दिल्ली (भारत) सुर्य की ओर रहता है और दिल्ली में दिन (1 PM) रहता है, तब ‘पश्चिमी-गोलार्ध’ के क्षेत्र न्यूयॉर्क (अमेरीका) में रात्रि (2:30 AM) रहती हैं।

इसके ठीक 12 घंटे बाद, यानी धरती के अपने स्थान पर – अपनी धूरी पर – आधा घूमने के बाद,जब पुरब की दिल्ली (भारत) में रात्रि (1 AM) रहती हैं, तब पश्चिम के न्यूयॉर्क में दिन (2:30 PM) रहता हैं।

ग्रीष्म-शीत ऋतु परिवर्तन का कारण

सूर्य-परिक्रमा करती अंडाकार धरती के पुरी परिक्रमा के दौरान सदैव एक ही ओर – एक ही दिशा में – 23.4 डीग्री के कोण पर झुके रहने के कारण ऋतु परिवर्तन होता है।

जब सदैव एक ही ओर – एक ही दिशा में – झुके रहते हुए धरती सूर्य परिक्रमा करती है, तो आधी परिक्रमा (छह-माह) के दौरान धरती का उत्तरी-गोलार्ध (ऊपरी-आधा-भाग) सूर्य की ओर झुका हुआ रहता है (चित्र में स्थिति-1), और बाकी की आधी परिक्रमा (छह-माह) के दौरान धरती का दक्षिणी-गोलार्ध (नीचला-आधा-भाग) सूर्य की ओर झूका हुआ रहता है (चित्र में स्थिति-2)।

जब धरती का उत्तरी-गोलार्ध सूर्य की ओर झूका हुआ रहता है, तो उस आधी परिक्रमा के दौरान दक्षिणी-गोलार्ध की ‘तुलना’ में उत्तरी-गोलार्ध का अधिक क्षेत्र सूर्य से प्रभावित होता है – सूर्य के सामने रहता है (चित्र में स्थिति-1)। इसके चलते, उत्तरी-गोलार्ध में सूर्य की अधिक गर्मी पहुंचने के कारण, उत्तरी-गोलार्ध में इस अवधि के दौरान ग्रीष्म ऋतु के आसपास का समय रहता है। और ठीक इसी अवधि के दौरान दक्षिणी-गोलार्ध में कम गर्मी पहुँचने के चलते शीत ऋतु के आसपास का समय चलता रहता है।

प्राचीनकालिन भारतीय विज्ञान

प्राचीनकालिन भारतीय विज्ञान बहुत उन्नत है। प्राचीनकाल से भारतीय ऋषि-मुनि उत्तरी-गोलार्ध के सूर्य की ओर झुके रहने के छह-माह (आधी सूर्य-परिक्रमा) की अवधि को ‘उत्तरायण’ का काल कहते आए हैं। उत्तरायण का काल ‘मकर संक्रांति पर्व’ की तिथि से आरंभ होता है।

इसी कारण से ‘मकर संक्रांति’ को भारत में कई स्थानों पर, मुख्यत: गुजरात में, ‘उत्तरायण’ भी कहते है क्योंकि इसी दिन से सूर्य ‘उत्तरायण’ हो जाते है – सूर्य तुलनात्मक रुप से धरती के उत्तरी-गोलार्ध के अधिक क्षेत्र को प्रभावित करना आरंभ कर देते हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि मकर-संक्रांति को पंजाब-हरियाणा में ‘लोहड़ी पर्व’, तमिलनाडू में ‘पोंगल पर्व’ और आसाम व पुर्वोत्तर में ‘बिहू पर्व’ के रुप में मनाया जाता है।

इसके बाद की आधी सूर्य-परिक्रमा के दौरान, अंडाकार धरती का झुकाव पहले की ही तरफ – पहले की ही दिशा में बने रहने के कारण, दक्षिणी-गोलार्ध सूर्य की ओर झुका हुआ रहता है और उत्तरी गोलार्ध सूर्य से विपरित दिशा की ओर झुका हुआ रहता हैं (चित्र में स्थिति-2)। इसके चलते, उत्तरी-गोलार्ध की तुलना में दक्षिणी-गोलार्ध के अधिक क्षेत्र को सूर्य प्रभावित करते हैें –

दक्षिणी-गोलार्ध के अधिक क्षेत्र के सामने सूर्य रहते हैं। परिणामस्वरुप, इस आधी-परिक्रमा के दौरान उत्तरी-गोलार्ध की तुलना में धरती का दक्षिणी-गोलार्ध सूर्य की अधिक गर्मी प्राप्त करता है और इस दौरान दक्षिणी-गोलार्ध में ग्रीष्म ऋतु व उसके आसपास का समय रहता हैं।

प्राचीनकाल से भारतीय ऋषि-मुनि दक्षिणी गोलार्ध के सूर्य की ओर झुके रहने के छह-माह (आधी सूर्य-परिक्रमा) के काल को ‘दक्षिणायण’ कहते आए हैं। ‘दक्षिणायण’ के आरंभ की तिथि पर भारत में ‘देवशयनी एकादशी पर्व’ मनाया जाता है।

इस प्रकार, अंडाकार झुकी धरती का जो गोलार्ध सूर्य की ओर झुका हुआ रहता है या सूर्य जिस गोलार्ध के अधिक क्षेत्र को प्रभावित करते है, वहां गर्मी अधिक पहुँचती है और वहां ग्रीष्म ऋतु व उसके आसपास का काल चलता रहता है। और इसी दौरान धरती का दूसरा गोलार्ध, जिसका तुलनात्मक रुप से कम क्षेत्र सूर्य के प्रभाव में आता है, वहां शीत ऋतु व उसके आसपास का समय चलता रहता है।

प्रत्यक्ष अनुभूति :-

  • जून 21 के दिन हम ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस‘ मनाते हैं, क्योंकि उत्तरी गोलार्ध, जिसमें योग विद्या के ज्ञान की गंगोत्री भारत भी है, उसमें यह ‘सबसे लंबा दिन’ रहता है।
  • यदी हम दिन की अवधि और क्षेत्र में पड़ने वाली गर्मी को जोड़कर देखें, तो जून 21, उत्तरी गोलार्ध का ‘सबसे बड़ा दिन (गर्माहट/ग्रीष्म ऋतु के आसपास का समय)’ रहता है।
  • लेकिन इसी समय – यही दिन, जून 21, दक्षिणी गोलार्ध का ‘सबसे छोटा दिन (ठंडक/शीत ऋतु के आसपास का समय)’ होता हैं (चित्र में स्थिति-1)। और इसके ठीक 6 माह (आधी सूर्य-परिक्रमा) के बाद, दिसंबर 21 या 22, उत्तरी गोलार्ध का ‘सबसे छोटा दिन (ठंडक)’ होता हैं।
  • लेकिन इसी समय – यही दिन, दिसंबर 21/22, दक्षिणी गोलार्ध में ‘सबसे बड़ा दिन (गर्माहट)’ रहता है (चित्र में स्थिति-2)।

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