नादिर शाह का इतिहास | History of Nadir Shah and His Empir In Hindi

नादर शाह का इतिहास | Nadir Shah Biogragphy, History, Empire, Rule In India, Delhi Violation | Nadir Shah ka Itihas

नादिर शाह को नादिर शाह अफसर, नादेर कोली बेग या तहमास कोली खान के नाम से भी जाना जाता है. नादिर शाह सत्रह सदी में सबसे शक्तिशाली ईरानी शासकों में से एक था. उसके बड़े और दमदार सैन्य के बल पर उसने कई लड़ाईया जित ली और बड़े क्षेत्र पर अपनी हुकूमत जमा ली थी. उसने भारत पर भी आक्रमण किया था. उस समय दिल्ली की सत्ता पर आसीन मुगल बादशाह मुहम्मद शाह आलम को हराने के बाद उसने खुप दौलत इकठ्ठा की थी, जिसमें कोहिनूर हीरा भी शामिल था. उसने दिल्ली में बेरहमी से कत्लेआम मचाया था.

प्रारम्भिक जीवन | Nadir Shah Early Life

नादिर शाह का जन्म उत्तर पूर्वी ईरान के खोरासान में अफ़्शार क़ज़लबस कबीले में एक साधारण परिवार में हुआ था. उसके पिता एक साधारण किसान थे. उसके पिताजी का देहांत उसके बचपन में ही हो गया था.

कहा जाता है कि, उज़्बेगो द्वारा उसे उसकी माँ के साथ बंदी बना रखा था. परन्तु, नादिर वहा से भाग निकलने में कामियाब रहा और वह एक अफ़्शार कबीले में शामिल हो गया. इसके बाद कुछ ही दिनों में वह एक तबके का प्रमुख बन गया. फिर, जल्द ही वह एक सफल सैनिक के रूप में उभरा और उसने एक स्थानीय प्रधान बाबा अली बेग़ की दो बेटियों से शादी कर ली.

नादिर के बारे में कहा जाता है कि, वह अपने शत्रुओं के प्रति निर्दय था लेकिन अपने अनुचरों और सैनिकों के प्रति उदार था. वह घोड़सवारी में माहिर था. उसकी आवाज़ काफी गंभीर किस्म की थी, और यह उसकी सफलता के पीछे की वजह बताई जाती है.

नादिर शाह और सफ़विद साम्राज्य | Nadir Shah and Safavid Empire

उस समय फ़ारस की गद्दी पर साफ़वियों का शासन था. वह साफ़वियों का मददगार था. नादिर शाह की सैन्य प्रतिभा तथा उसकी कार्य शैली को देख सफ़विद उससे काफी प्रभावित हो चुके थे. उस समय साफ़वियो को दो साम्राज्यों से धोखा था – पहला उस्मानी साम्राज्य और दूसरा अफगानी साम्राज्य. इसके अलावा उत्तर से रुसी साम्राज्य की भी साफ़वियो पर गहरी नजर थी.

शाह सुल्तान हुसैन के बेटे तहमास्य ने नादिर का साथ दिया. उसके साथ मिलकर उसने उत्तरी ईरान में मशहद, जो ख़ोरासान की राजधानी थी, उसे अफगानों को भगाकर अपने अधिकार में ले लिया. इस कार्य से प्रभावित होकर उसे तहमास्य क़ुली ख़ान की उपाधि प्रधान की गयी थी.

अफगानों ने राजधानी इस्फ़हान पर कब्ज़ा कर लिया था. 1729 के अंत तक उसने अफ़गानों को तीन बार हराया और इस्फ़हान वापस अपने नियंत्रण में ले लिया. इसके बाद उसने अपनी सैन्य को और मजबूत बनाने केलिए, शाह तहमाश्प से भारी कर वसूल करवाया. सैन्य ताकतवर होने के बाद उसने अफगानों के साथ साथ अन्य साम्राज्य जिनसे उन्हें धोखा था उनपर नियंत्रण किया, जिसमें उस्मानी साम्राज्य और उत्तर में रूसी साम्राज्य का समावेश था.

नादिर की सैन्य सफलता तहमाश्प से देखी नहीं गयी. उसने अपनी सैन्य योग्यता साबित करने केलिए उस्मानों के साथ फिर से युद्ध शुरू कर दिया, लेकिन वह हार गया और उसे नादिर द्वारा जीते हुए कुछ प्रदेश उस्मानों को लौटाने पड़े.

भारत पर आक्रमण | Nadir Shah Invasion of India

पश्चिमी दिशा में अच्छा ख़ासा प्रदेश अपने अधिकार में लाने के बाद वह पूर्व दिशा में ध्यान केंद्रित करने लगा. उसने पूर्व दिशा में सबसे पहले कन्दहार पर अधिकार कर लिया. इस बात का बहाना बना कर कि मुगलों ने अफ़गान भगोड़ों को शरण दे रखी है उसने मुगल साम्राज्य की ओर कूच किया. उसने फिर काबुल पर अधिकार जमाया और दिल्ली पर अपना निशाना साधा और आक्रमण कर दिया. करनाल में मुगल राजा मोहम्मद शाह और नादिर की सेना के बीच लड़ाई हुई. इस जंग में सेना छोटी होने के बावजूद नादिर की सेना ने जित हासिल की.

1739 में जब वह दिल्ली पहुंचा, उस समय यह अफ़वाह फैली कि नादिर शाह मारा गया. इससे दिल्ली में भगदड़ मच गई और फारसी सेना का कत्ल शुरू हो गया. उसने इसका बदला लेने के लिए दिल्ली में भयानक कत्लेआम मचाया था. कहते है कि, एक दिन में उसने 20000-22000 लोगों की ह्त्या कर दी. इसके आलावा उसने उस समय दिल्ली की सत्ता पर आसीन मुगल बादशाह मुहम्मद शाह आलम से विपुल धनराशि भी जप्त कर ली.

मोहम्मद शाह ने सिंधु नदी के पश्चिम की सारी भूमि भी नादिर शाह को दान में दे दी. हीरे जवाहरात का एक ज़खीरा भी उसे भेंट किया गया जिसमें कोहिनूर हिरा भी शामिल था. कहा जाता है कि दिल्ली से लौटने पर उसके पास इतना धन हो गया था कि अगले तीन वर्षों तक उसने जनता से कर नहीं लिया था.

नादिर शाह का मकबरा मशाद | Nadir Shah’s Mashad Tomb

नादिर शाह ने ग्यारह वर्षों तक शासन किया और अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई उपलब्धियां हासिल कीं. नादिर शाह अफसर का मकबरा एक इमारत है जिसका निर्माण मशहद शहर में नादिर शाह की याद में किया गया था. 1917 में क़ाज़र युग के अंतिम वर्षों में क़व्वा अल सल्ताना ने अपने मकबरे के खंडहरों के लिए उनके लिए एक नया मक़बरा बनवाया और तेहरान से उनके मकबरे तक उनकी अस्थियाँ स्थानांतरित कीं.

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